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Sunday, December 9, 2018

क्यों नही करनी चाहिए एक गोत्र में शादी? जाने एक ही गोत्र में शादी करने के नुकसानों के बारे में

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 युवावस्था तो नही लेकिन पूर्वजों और बुज़ुर्गों ने यह एक वाक्य अवश्य सुना है कि एक ही गोत्र में शादी नही करनी चाहिए। आज मैं आपसे इसी विषय के बारे में विश्लेषण करने वाला हूँ। जिसके सन्दर्भ में अमेरिकी विज्ञानिक कहते है कि आनुवंशिक बीमारियां ना हों। इसका एक मात्र इलाज़ वह है यानि अपने नज़दीकी रिश्तेदारों से शादी नही करनी चाहिए। क्योंकि नज़दीकी रिश्तेदारों में जींस अलग नही हो पाते हैं और वही जींस एक- दूसरे में  स्थानांतरित होते रहते हैं।
जींस सम्बंधी बीमारियां जैसे- हिमोफेलिया, कलर ब्लाइंडनेस और अल्बिनिस्म होने की लगभग 100 प्रतिशत तक होने के चांस बने रहते हैं।
मुझे अक्सर यह जानकर ख़ुशी हुई कि हिन्दू धर्म में हज़ारों साल पहले जींस और डीएनए के बारे में कैसे लिखा गया?
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हिंदुत्व में कुल सात गोत्र होते हैं और एक गोत्र के लोग आपस में शादी नही कर सकते हैं। 27 तरह के गोत्र होते हैं ताकि जींस विभाजित रहें।
वैज्ञानिकों ने कहा कि आज पूरे विश्व को मनना पड़ेगा कि, हिन्दू धर्म ही विश्व का एक मात्र धर्म है, जो विज्ञान पर आधारित है। हिन्दू परम्पराओं से जुड़े तथ्य वैज्ञानिक आहार कई लोग इसपर शोध कर चुके हैं कि एक ही गोत्र में शादी नही करनी चाहिए। गोत्र शब्द से अभिप्राय, एक कुल अथवा वंश से है। वास्तव में गोत्र प्रणालिका जो विशेष उद्देश्य है वह उसको मूल प्राचीनतम व्यक्ति से जोड़ता है। जैसे कि
एक व्यक्ति का गोत्र भारद्वाज है तो इसका मतलब यह है कि उसके पूर्वज माहार्षि भारद्वाज से सम्बंधित हैं। 27 गोत्र से 27 गोत्र बने हैं या ऐसा भी कह सकते हैं कि उस व्यक्ति का जन्म भरद्वाज पीढी में हुआ है। आपने एक ही गोत्र से जुडी बहुत सी बातों को सुना होगा कि कई लोग आपस में शादी कर लेते हैं। जैसे मामा के लड़के से शादी करना कई लोग ऐसे होते हैं जो चाचा के बेटे से शादी कर लेते हैं। जिसके कारण अन्य विवाद होते हैं क्योंकि उन्होंने अपने घर वालों की इच्छा के विरुद्ध शादी कर ली। खाप पंचायत ने एक प्रकार के गोत्र विवाह को ग़ैर- कानूनी तक कर दिया है। आइए जानते हैं कि एक गोत्र के इस पूरे विवाद में और ग्रन्थों, पुराणों में क्या लिखा गया है ?
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भारद्वाज, कश्यप, गौतम, वाशिष्ठ, विद्याश्रम, अत्रि और जन्माग्नि इन सात ऋषियों और आठवे ऋषि अगस्त्य की सन्तान गोत्र कहलाती है। ब्राह्मीणों के विवाह में गोत्र प्रवाह का बहुत महत्व है। स्म्रति ग्रंथों में बताया गया है कि अगर कोई कन्या सह-गोत्र हो लेकिन सह-प्रवर ना हो अथवा सह-प्रवर हो किन्तु सह-गोत्र ना हो तो किसी कन्या के विवाह को अनुमति नही दी जानी चाहिए। आपको एक प्रकार से इन सभी बातों पर विश्वाश करना चाहिए क्योंकि आप स्तम्भ धर्म सूत्र कहता है कि सामान्य गोत्र के पुरुष को कन्या नही देनी चाहिए। असामान्य गोत्रीय के साथ विवाह ना करने पर मूल पुरुष के ब्रह्मीणत्व से श्रुत्व हो जाने और चांडाल पुत्र, पुत्री के उत्पन्न होने का आभाव कहा गया है। यानि अगर ऐसा विवाह होता है, तो सन्तान गलत होती है।
बहुत सारे विवाह में आपने ऐसा देखा होगा कि सह-गोत्रीय विवाह में कई लोगों की संतानें नही हुई, यदि हुई भी तो अपंग पैदा हुई हैं। बहुत सी तकलीफों वाले बच्चों का जन्म हुआ है। अगर लोगों को संतान होती है तो उनको उस सन्तान में से मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Muscular Dystrophy) जैसी बीमारी होती है, जिसमे जैसे- जैसे उम्र बढ़ती है मांशपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं और 20- 25 साल की उम्र अधिकाँश बताई गयी है और उसके बाद मृत्यु हो जाती है।

शादी में केवल लड़के और लड़की का गोत्र ही नही बल्कि माँ का भी गोत्र मिलाना चाहिए। बल्कि तीन पीढियों में गोत्र सामान्य नही होना चाहिए। तभी शादी तय करनी चाहिए।
सह-गोत्रीय कन्या से विवाह करता है तो उसे उस कन्या का मातृत्व पालन करना चाहिए। गोत्र जन्म से पालन नही होता है इसलिए विवाह के समय कन्या का गोत्र बदला जाता है और उसके लिए उसके पति का गोत्र लागू हो जाता है। जब वही कन्या की मृत्यु होती है तो वापिस उसको माँ के गोत्र में भेज दिया जाता है, लेकिन यह एक अलग विषय है।

हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक ही कुल या गोत्र के साथ विवाह करने पर प्रतिबन्ध इसलिए लगाया गया क्योंकि दाम्पति यानि पति- पत्नी की सन्तान आनुवांशिक दोष के साथ उत्पन्न होती है। ऐसी दाम्पतियों की संतान में एक सी पसन्द, विचारधाराएं और असामान्य देखी जा सकती हैं नयापन कुछ नही होता है। ऐसे बच्चों में रचनात्मक का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस विषय पर यह बात कही गयी है कि सह-गोत्र शादी करने पर अधिकाँश लोगों में जो संतानें पैदा होती हैं उनमें अनुवांशिक दोष अथार्थ पिता को चिंता, डिप्रेशन या कई घरों में ऐसे प्रयास हुए हैं की उनके दादा जी को कोई बीमारी थी, जोकि अनुवांशिक थी तो वह हमारे बच्चों में आ जाते हैं। आप अपने बच्चों के बारे में सोचिये की कहीं ऐसा तो नही कि उनके कुछ गुण बच्चों में आ चुके हैं। अनुवांशिक गुण अथार्थ मानसिक विकलांगता, अपंगता, गम्भीर रोग, आँखों की तकलीफे जन्म- जाति पायी जा सकती हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्ही कारणों की वजह से सह- गोत्र की शादी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था।

हमारे हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का एक मुख्य कारण यह भी है कि एक ही गोत्र में होने से वह पुरुष और स्त्री भाई- बहन कहलाते हैं क्योंकि उनके पूर्वज एक ही थें, लेकिन यह बात थोड़ी अजीब नही कि जिन स्त्री, पुरुष ने एक- दूसरे को कभी देखा तक नही है और दोनों अलग- अलग देशों में, पर एक ही गोत्र में जन्में है इसलिए वह भाई- बहन कहलायें। इसका मुख्य कारण एक ही गोत्र में होने का गुणसूत्र में सामान्यता का भी शेष वर्णन किया गया है। पुरुष जितनी भी अधिक दूरी पर शादी करते हैं उनकी सन्तान उतनी ही अधिक प्रभावशाली और गुणवान होती है। इसमें अनुवांशिक यानि पौत्रिक तंत्र होने की सम्भावना कम से कम हो जाती है। उनके गुणसूत्र बहुत मज़बूत होते हैं और जो भी परिस्थितियां होती हैं उनका वो उतनी ही दृढ़ता के साथ मुक़ाबला करते हैं।

दोस्तों, हम जब सिर्फ शादी करने के लिए नही पैदा हुआ हैं, हमें एक अच्छा जीवन जीना है। अगर हम एक अच्छा जीवन नही जी रहे हैं तो इसका कारण कुछ हद तक यह भी हो सकता है कि हमारे माता- पिता ने सह-गोत्रीय विवाह कर लिया है जिस वजह से हम तकलीफ में है। लेकिन कहीं हम आने वाले बच्चों को तो नही तकलीफ दे रहे हैं। ध्यान रखियेगा कि एक ही गोत्र में शादी करना गलत है। बहुत से लोगों को अपने कुल देवी- देवताओं के बारे में मालूम नही है।
हिन्दू ने मुस्लिम से और मुस्लिम ने ईसाई धर्म से शादी कर ली। कुछ भी नही मालूम है। इसी कारण से हम तलाक़ की तर फ जा रहे हैं और हमारा सम्बन्ध विच्छेद हो रहा है। जिसकी वजह से मानसिक तनाव हो रहा है और बहुत सी तकलीफे हो रही हैं। इन बातों पर गौर करना चाहिए और आने वाली पीढियों को हम एक बेहतर जीवन दे सकें, इसके लिए सह- गोत्रीय विवाह नही करना चाहिए और इन बातों की सही जानकारी भी लेनी चाहिए।

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